असमंजस
असमंजस
कथा है वीरों के शौर्य और बलिदान की,
हमारे भारतीय शेरों के सम्मान की।
ना बंदूक ना कोई गोली, वे शांति लेने पहुंचे थे,
मगर क्या पता था कि, वहां भेड़िए औजार लेकर बैठे थे।
घिर गए निहत्थे, वे मां भारती के लाल थे,
थी विपरीत परिस्थिति, पर हमारे देश भक्त भी कमाल थे।
और घायल शेर भी क्या, कुत्तों से भागा करते हैं,
हम तो वह फौलाद हैं जनाब, जो दस-दस को मार गिराया करते हैं।
वहां एक-एक ने कईयों को मार गिराया था,
यही हार देकर दुश्मन ने दुनिया से मुंह छुपाया था।
" दोस्तों बाजी तो हम जीत गए मगर कांटा निकालना बाकी है "
मैं नफरत करती हूं उन गद्दारों से,
मैं नफरत करती हूं उन गद्दारों से,
जो मां के आंचल में रहकर मां का गला काटते हैं।
खाते हैं मेरे देश की ,
खाते हैं मेरे देश की,
और तलवा दुश्मनों का चाटते हैं।
वो क्या समझते हैं, हम उन्हें पहचानते नहीं,
वह तो हमारे देश में भाईचारा है, इसलिए हम उन्हें मारते नहीं।
पर तुम हमारी रहम दिली को, हमारी नाकामी मत समझना,
जब हम तलवार उठाते हैं, तो मुश्किल है दुश्मन का बचना।
जब हम अंग्रेजों से नहीं डरे, तो तुम्हारी बिसात क्या है,
तुम्हें तो हम चुटकी में मसल देंगे, तुम्हारी औकात ही क्या है?
- सरिता मिश्रा
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