लीजिए आसिफा के बलात्कारियों को बचा लिया गया

अंधा न्याय 

लीजिए आसिफा के बलात्कारियों को बचा लिया गया। महीनों कठुआ की जनता चीख चीख कर कहती रही, छाती कूटती रही कि सांझीराम और उसका लड़का, भतीजा बलात्कारी नहीं हैं लेकिन इस देश में हिंदू की सुनता कौन है।

इस केस की कुछ बातें सेक्युलर षडयंत्र जिसमें जम्मू-कश्मीर की मुफ्ती सरकार, मीडिया और मीलार्ड की मिली भगत की ओर इशारा करती हैं।


  1.  सबसे पहले केस की सुनवाई जम्मू-कश्मीर से बाहर पंजाब में होना। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट का यही नजरिया हम गुजरात में देख चुके हैं जब वहां के मामलों को गुजरात में नहीं, महाराष्ट्र में सुना गया। इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट की मानीटिरिंग थी लेकिन इन मीलार्डों की आंखों के सामने और नाक के नीचे दिल्ली में हुये हजारों सिखों के हत्यारों की सुनवाई कभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई गंभीर रुचि तक नहीं दिखलायी। नतीजा सामने है 34 साल बाद भी अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। क्यों? इसलिए कि जब हिंदुओं को फंसाना हो और मुस्लिमों को बचाना हो तो न्याय का लबादा ओढ़े भेड़िये सक्रिय हो उठते हैं।
  2. पहली बार किसी मामले में चार पुलिस वालों को भी साक्ष्य मिटाने का दोषी बताकर सलीब पर टांग दिया गया है। ये वही पुलिस वाले हैं जिन्होंने शुरूआती जांच की थी और इन्हेें दोषी नहीं पाया था। आनन फानन में मुफ्ती सरकार ने क्राइमब्रांच को मामला देकर इन्हें दोषी बना दिया। वहां की जनता मंदिर परिसर में बच्ची के बलात्कार की कहानी को झुठलाती रही।
  3. विशाल गंगोत्रा जो मेरठ में बीटेक का छात्र था उसे भी अपराधी बना दिया। भला हो उसी समय की एटीएम की वीडियो क्लिप का जिसमें वह एटीएम से मेरठ में रुपये निकाल रहा था। उसको निर्दोष करार देने वाले मीलार्ड से दो सवाल जरूर पूंछे जाने चाहिए -
  • सिद्ध हो गया कि विशाल को झूठा फंसाया गया है तो उसको झूठा फंसाने वाले पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही क्यों नहीं? अगर साक्ष्य मिटाने के आरोप में हिंदू पुलिस कर्मियों को सजा हो सकती है तो एक निरपराधी को फांसी के फंदे पर लटकाने की साजिश रचने वाले मुस्लिम पुलिस कर्मियों पर हत्या के प्रयास का मुक़दमा क्यों नहीं चलना चाहिए। 
  • जब एक आरोपी पुलिसिया साजिश में झूठा फंसाया गया तो बाकी आरोपियों को क्या झूठा नहीं फंसाया गया होगा? उन बेचारों के पास विशाल की तरह कोई वीडियो क्लिप नहीं थी। 
  • 👉इस मामले में मुफ्ती सरकार की साझीदार और केंद्र में काबिज बीजेपी सरकार भी दोषी है। जब पूरा जम्मू क्षेत्र आक्रोशित था और इन सबको निर्दोष बता रहा था, मुफ्ती सरकार की साजिशों पर उंगली उठा रहा था, विशाल की वीडियो क्लिप चीख चीख कर मामले को साजिश करार देरही थी तब ये हाथ पर हाथ रखे बैठे थे। जब मुफ्ती सरकार प्राथमिक जांच को छीनकर मनमाफिक चार्जशीट बनाने के लिए मामला क्राइमब्रांच को दे सकती थी, जिसकी निष्पक्षता पर जनता उंगली उठा रही थी  तब आपने सीबीआई या किसी अन्य एजेंसी से जांच क्यों नहीं करायी ?


जब सेक्युलर लॉबी जम्मू-कश्मीर के बाहर मामले की सुनवाई के लिए दबाब बना रहे थे, आपकी सरकार ने इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप क्यों नहीं किया ?जिनके वोटों से आप जम्मू रीजन की 28 सीटें जीतकर सत्ता की चाशनी चाट रहे थे, उन्हें आपने अपने हाल पर छोड़ देने का अपराध किया है।

कानून सिर्फ सुबूत देखता है ये सिर्फ एक फिकरा है। क्या कोई पिता अपने लड़के, नाबालिग भतीजे के साथ 8 साल की बच्ची से बलात्कार कर सकता है, वह भी हिंदू? मुस्लिमों के पैगंबर ने तो 9 साल की बच्ची से सेक्स करके इसकी प्रेरणा दी है लेकिन हजारों वर्ष के हिंदू इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है। परिणामस्वरूप पूरे देश में  अबोध हिंदू बालिकाओं के साथ दुष्कर्म और उनकी हत्या की बाढ़ आयी हुई है और मॉब लिंचिंग पर भौंहे चढ़ाने वाले मीलार्ड एसी में बैठकर आइसक्रीम चाट रहे हैं। सुबूत से हटकर इस मानसिकता पर भी विचार होना चाहिए था।

एक और कानूनी कहावत है - चाहे सौ दोषी छूट जांय लेकिन एक बेकसूर को सजा नहीं होना चाहिए। 
यहां तो विशाल को संदेह का लाभ नहीं मिला है अपितु साक्ष्य का समर्थन मिला है फिर भी सात निरपराध फांसी की बाट जोह रहे हैं। इस पूरे केस का फैब्रीकेशन और उसकी सुनवाई ब्रिटिश शासन काल में क्रांतिकारियों के नाम पर अनेक निरपराधों को फांसी के फंदे पर लटकाने से ही की जासकती है।

बार बार इस देश में ये सिद्ध हो रहा है कि हिंदू होना पाप है, भारतमाता की जय बोलना और भी जघन्य पाप है। झूठा फंसाकर हमें फांसी के फंदे पर लटकाया जायेगा और हमारी बहू बेटियों, बच्चियों को नोचा जायेगा जिसमें न्याय का काला लबादा ओढ़े कलमुंहे भेड़ियों के साथ हमारे गोश्त का आनंद लेंगे।

अंत में जिस राष्ट्रवादी दल की सरकार है उससे हमारा निवेदन अपराधियों को बचाने का कतई नहीं है लेकिन हिंदू विरोधी मानसिकता और भेड़ियों के खिलाफ खुल कर खड़े होने का है। अगर यही हाल रहा तो या तो हमारा नामलेवा नहीं रहेगा या ये आतंकी व्यवस्था का अंतिम संस्कार ये देश देखेगा।

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