हम इस पोर्टल के माध्यम से स्वर्णिम भारत की नींव मजबूत करने के लिए युवा वर्ग को आमंत्रित कर रहे हैं, हम आज यह नहीं कह सकते कि हमारा यह सफर भारतवर्ष के गौरव को किन ऊंचाइयों तक ले जायेगा परन्तु हम अपने देश की नई युवा पीढ़ी की क्षमताओं पर बहुत विश्वास करते हैं।
जय हिन्द।
We are inviting young people to strengthen the foundation of Golden India through this portal. We believe very much on the capabilities of New Young Generation of India. Jai Hind.
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जी का जन्म 23 जनवरी 1897 (दोपहर 12.10 बजे) उड़ीसा डिवीजन, बंगाल प्रांत में, प्रभाती दत्त बोस और जानकीनाथ बोस, एक कायस्थ परिवार से थे। वह अपने इस 14 बच्चों वाले परिवार में नौवें स्थान पर थे।
उन्हें जनवरी 1902 में अपने भाइयों और बहनों की तरह कटक के प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल (वर्तमान में स्टीवर्ट हाई स्कूल) में पढ़ने भेजा गया था। उन्होंने इस स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखी, यहाँ उनके साथी छात्रों द्वारा उनका उपहास किया गया क्योंकि वह बहुत कम बंगाली जानते थे। जिस दिन सुभाष को इस स्कूल में भर्ती कराया गया, हेडमास्टर बेनी माधब दास समझ गए कि उनकी प्रतिभा कितनी विशिष्ट और वैज्ञानिक है। 1913 में मैट्रिक परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल करने के बाद, उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया, वहां 16 वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण के कार्यों को पढ़ने के बाद उनकी शिक्षाओं से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महसूस किया कि उनका धर्म उनकी पढ़ाई से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। उन दिनों, कलकत्ता में अंग्रेजों ने अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर भारतीयों पर आपत्तिजनक टिप्पणी और उनका खुलेआम अपमान किया करते थे। प्रथम विश्व युद्ध के साथ-साथ अंग्रेजों का यह व्यवहार उनकी सोच को प्रभावित करने लगा। उनका राष्ट्रवादी स्वभाव तब सामने आया जब उन्हें प्रोफेसर ओटेन (जिन्होंने कुछ भारतीय छात्रों के साथ भारत विरोधी टिप्पणी के लिए हमला करने के लिए निष्कासित कर दिया था।) ने उन्हें निष्कासित कर दिया था, हालांकि उन्होंने अपील की थी कि उन्होंने केवल हमले को देखा था और वास्तव में इसमें भाग नहीं लिया था। बाद में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से बी.ए. दर्शनशास्त्र(1918) में पूरा किया और 1919 में अपने पिता से किए एक वादे के साथ इंग्लैंड चले गए कि वे भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा में शामिल होंगे। वह फिट्ज़विलियम कॉलेज, कैम्ब्रिज में अध्ययन करने लगे और 19 नवंबर 1919 को मैट्रिक पूरा किया। वह आईसीएस(ICS) परीक्षा में चौथे स्थान पर आए और उनका चयन भी हुआ, लेकिन वह एक विदेशी सरकार के अधीन काम नहीं करना चाहते थे जिसका अर्थ होता है अंग्रेजों की सेवा करना। 1921 में जब उन्होंने भारतीय सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया, तो उन्होंने अपने बड़े भाई शरत चंद्र बोस को लिखा:
"त्याग और पीड़ा की धरती पर ही हम अपना राष्ट्रीय गौरव बढ़ा सकते हैं।"
सुभाष चंद्र बोस हमारे देश के एक राष्ट्रवादी विचारधारा वाले देशभक्त थे, जिसकी वजह से आज वो सभी भारतीयों के हीरो हैं। हमारे सम्माननीय नेताजी 1920 एवम् 1930 के दशक के उत्तरार्ध में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के युवा, कट्टरपंथी नेता थे, जो 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष बने। हालांकि, उन्हें 1939 में ही कांग्रेस के नेतृत्व के पदों से हटा दिया गया। महात्मा गांधी और कांग्रेस हाईकमान के साथ मतभेद के बाद उन्हें 1940 में भारत से भागना पड़ा और बाद में अंग्रेजों द्वारा नजरबंद कर दिया गया था। बोस अप्रैल 1941 में जर्मनी पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नेतृत्व का अप्रत्याशित पेशकश की। नवंबर 1941 में, जर्मन से मिले आर्थिक मदद से, बर्लिन में एक फ्री इंडिया सेंटर स्थापित किया, और फिर एक फ्री इंडिया रेडियो प्रसारित किया, जिस पर बोस ने सीधे प्रसारण किया। एडोल्फ हिटलर ने मई 1942 में बोस के साथ अपनी एकमात्र मुलाकात के दौरान, एक पनडुब्बी की व्यवस्था करने की पेशकश की। इस दौरान नेता जी पिता बन गए, उनकी पत्नी, एमिली शेंकल, जिनसे वे 1934 में मिले थे, नवंबर 1942 में एक बच्ची को जन्म दिया। जापानी समर्थन के साथ, बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) को पुनर्जीवित किया, फिर ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सैनिकों से बना जिन्हें सिंगापुर की लड़ाई में पकड़ लिया गया था। लंबे समय से पहले, बोस की अध्यक्षता में स्वतंत्र भारत की अनंतिम सरकार का गठन जापानी-कब्जे वाले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में किया गया था। 1944 के अंत और 1945 की शुरुआत में ब्रिटिश भारतीय सेना पहले रुक गई और फिर विनाशकारी रूप से भारत पर जापानी हमले को उलट दिया। लगभग आधे जापानी बलों और पूरी तरह से भाग लेने वाले आईएनए के लगभग आधे लोग मारे गए थे। इसके बाद ताइवान में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, परन्तु वह किसी तरह बच गए और अपने ही देश में वेश बदल कर रहने लगे थे। बीबीसी न्यूज़ से मिले जानकारी के अनुसार:
दूसरे युद्ध में जापान की हार के बाद सुदूर पूर्व में उसकी सेनाएं बिखर चुकी थीं. उनका मनोबल बुरी तरह से गिरा हुआ था.
सुभाषचंद्र बोस भी सिंगापुर से बैंकाक होते हुए सैगोन पहुंचे थे.
वहाँ से आगे जाने के लिए एक भी जापानी विमान उपलब्ध नहीं था. बहुत कोशिशों के बाद उन्हें एक जापानी बमवर्षक विमान में जगह मिली.
हवाई अड्डे पर छोड़ने आए अपने साथियों से उन्होंने हाथ मिला कर जय हिंद कहा और तेज़ी से कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर विमान में अन्तर्धान हो गए.
उनके एडीसी कर्नल हबीबुर रहमान ने भी सब को जयहिंद कहा और उनके पीछे पीछे विमान पर चढ़ गए.
सीट पर न बैठ कर विमान की ज़मीन पर बैठे थे बोस
नेताजी की मौत पर 'लेड टू रेस्ट' किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार आशिस रे बताते हैं, "उस विमान में क्रू समेत 14 लोग सफ़र कर रहे थे. पायलट के ठीक पीछे नेताजी बैठे हुए थे. उनके सामने पैट्रोल के बड़े बड़े 'जेरी केन' रखे हुए थे. नेताजी के पीछे हबीब बैठे हुए थे."
"विमान में घुसते ही जापानियों ने नेताजी को सह पायलट की सीट देने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने उसे विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था. वजह ये थी कि नेताजी जैसे बड़े कदकाठी वाले शख़्स के लिए वो सीट काफ़ी छोटी थी."
"पायलट और लेफ़्टिनेंट जनरल शीदे के अलावा सभी लोग विमान की ज़मीन पर बैठे हुए थे. नेताजी को एक छोटा सा कुशन दिया गया था ताकि उनकी पीठ को अराम मिल सके. इन सभी लोगों के पास कोई सीट बेल्ट नहीं थी.
इमेज कॉपीरइटNETAJI RESEARCH BUREAUImage captionकर्नल हबीबुर्रहमान (बाएं से पहले खड़े हुए हैं)
विमान का प्रोपेलर टूट कर नीचे गिरा
उस बमवर्षक विमान के भीतर बहुत ठंड थी. उस ज़माने में युद्धक विमानों में 'एयर कंडीशनिंग' नहीं होती थी और हर 1000 मीटर ऊपर जाने पर विमान का दर का तापमान छह डिग्री गिर जाता था. इसलिए 4000 फ़ीट की ऊंचाई पर तापमान धरती के तापमान से कम से कम 24 डिग्री कम हो गया था.
उड़ान के दौरान ही उन्होंने रहमान से अपनी ऊनी जैकेट मांग कर पहन ली. दोपहर 2 बज कर 35 मिनट पर बमवर्षक ने ताईपे से आगे के लिए उड़ान भरी.
शाहनवाज़ कमीशन को दिए अपने वक्तव्य में कर्नल हबीबुर्रहमान ने बताया, "विमान बहुत ऊपर नहीं गया था और अभी एयरफ़ील्ड सीमा के अंदर ही था कि मुझे विमान के सामने के हिस्से से धमाके की आवाज़ सुनाई दी. बाद में मुझे पता चला कि विमान का एक प्रोपेलर टूट कर नीचे गिर गिया था. जैसे ही विमान नीचे गिरा उसके अगले और पिछले हिस्से में आग लग गई"
इमेज कॉपीरइटNETAJI RESEARCH BUREAUImage captionसल 1943 में सिंगापुर में आज़ाद भारत फ़ौज की परेड की सलामी लेते हुए नेताजी
पेट्रोल से सराबोर आग के बीच से निकले नेताजी
कर्नल हबीबुर रहमान ने आगे कहा, "विमान गिरते ही नेताजी ने मेरी तरफ़ देखा. मैंने उनसे कहा, 'नेताजी आगे से निकलिए, पीछे से रास्ता नहीं है.' आगे के रास्ते में भी आग लगी हुई थी. नेताजी आग से हो कर निकले. लेकिन उनका कोट सामने रखे जेरी कैन के पेट्रोल से सराबोर हो चुका था."
"मैं जब बाहर आया तो मैंने देखा कि नेताजी मुझसे 10 मीटर की दूरी पर खड़े थे और उनकी निगाह पश्चिम की तरफ़ थी. उनके कपड़ों में आग लगी हुई थी. मैं उनकी तरफ़ दौड़ा और मैंने बहुत मुश्किल से उनकी 'बुशर्ट बेल्ट' निकाली. फिर मैंने उन्हें ज़मीन पर लिटा दिया. मैंने देखा कि उनके सिर के बाएं हिस्से पर 4 इंच लंबा गहरा घाव था."
"मैंने रुमाल लगा कर उसमें से निकल रहे ख़ून को रोकने की कोशिश की. तभी नेताजी ने मुझसे पूछा, आपको ज़्यादा तो नहीं लगी ? मैंने कहा 'मैं ठीक हूँ.'
"उन्होंने कहा 'मैं शायद बच नहीं पाउंगा.' मैंने कहा, 'अल्लाह आपको बचा लेगा.' बोस बोले, 'नहीं मैं ऐसा नहीं समझता. जब आप मुल्क वापस जाएं तो लोगों को बताना कि मैंने आख़िरी दम तक मुल्क की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी. वो जंगे-आज़ादी को जारी रखें. हिंदुस्तान ज़रूर आज़ाद होगा."
इमेज कॉपीरइटNETAJI RESEARCH BUREAUImage caption1945 में ली गई इस तस्वीर में बोस बैंकॉक में हैं. इस तस्वीर पर उन्हीं के हस्ताक्षर हैं.
नेताजी ने जापानी भाषा में पानी मांगा
10 मिनट के अंदर बचाव दल हवाई अड्डे पर पहुंच गया. उनके पास कोई एंबुलेंस नहीं थी. इसलिए बोस और बाक़ी घायल लोगों को एक सैनिक ट्रक में लिटा कर 'तायहोकू' सैनिक अस्पताल पहुंचाया गया. नेताजी के सबसे पहले देखने वालों में वहाँ तैनात डाक्टर तानेयाशी योशिमी थे.
उन्होंने 1946 में हांगकांग की एक जेल में उनसे पूछताछ करने वाले ब्रिटिश अधिकारी कैप्टेन अल्फ़्रेड टर्नर को बताया था, "शुरू में सारे मरीज़ों को एक बड़े कमरे में रखा गया. लेकिन बाद में बोस और रहमान को दूसरे कमरे में ले जाया गया. क्योंकि दुर्घटना के शिकार जापानी सैनिक दर्द में चिल्ला रहे थे और शोर मचा रहे थे. "
"बोस को बहुत प्यास लग रही थी. वो बार बार जापानी में पानी मांग रहे थे, मिज़ू, मिज़ू... मैंने नर्स से उन्हें पानी देने के लिए कहा."
इमेज कॉपीरइटNETAJI RESEARCH BUREAUImage captionआज़ाद हिंद फ़ौज की सलामी लेते सुभाष चंद्र. उनके साथ हैं कैप्टन लक्ष्मी सहगल.
दिल तक जल गया था नेताजी का
डाक्टर याशिमी सुभाष बोस के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए आगे बताते हैं, "3 बजे एक भारी शख़्स को सैनिक ट्रक से उतार कर 'स्ट्रेचर' पर लिटाया गया. उसका माथा, सीना, पीठ, गुप्तांग, हाथ और पैर सब बुरी तरह से जले हुए थे. यहाँ तक कि उनका दिल तक जल गया था."
"उनकी आँखें बुरी तरह से सूजी हुई थीं. वो देख तो सकते थे लेकिन उन्हें अपनी आँखे खोलने में बहुत दिक्कत हो रही थी. उन्हें तेज़ बुखार था- 102.2 डिग्री. उनकी नाड़ी की गति थी 120 प्रति मिनट."
"उनके दिल को आराम पहुंचाने के लिए मैंने 'विटा- कैंफ़ोर' के चार और 'डिजिटामाइन' के दो इंजेक्शन लगाए. फिर मैंने उनको 'ड्रिप' से 1500 सीसी 'रिंजर सॉल्यूशन' भी चढ़ाया."
"इसके अलावा संक्रमण को रोकने के लिए मैंने उन्हें 'सलफ़नामाइड' का इंजेक्शन भी लगाया. लेकिन मुझे पता था इसके बावजूद बोस बहुत अधिक समय तक जीवित रहने वाले नहीं हैं."
इमेज कॉपीरइटआशिस रे
गाढ़े रंग का ख़ून
वहाँ पर एक और डाक्टर योशियो ईशी भी मौजूद थे. उन्होंने भी सुभाष बोस की हालत का विस्तृत विवरण खींचा है.
"दो घायल लोग दो पलंगों पर लेटे हुए थे. वो इतने लंबे थे कि उनके पांव पलंग से बाहर लटक रहे थे. एक नर्स ने मुझे बुला कर कहा, डाक्टर ये भारत के चंद्र बोस हैं. ख़ून चढ़ाने के लिए मुझे इनकी नस नहीं मिल रही है. उसे ढ़ूढ़ने में मेरी मदद करिए."
"मैंने जब ख़ून चढ़ाने के लिए सुई उनकी नस में घुसाई तो उनका कुछ ख़ून वापस सुई में आ गया. वो गाढ़े रंग का था. जब मौत नज़दीक होती है तो ख़ून में आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और ख़ून का रंग बदलने लगता है."
"एक चीज़ ने मुझे बहुत प्रभावित किया. दूसरे कमरे में इस दुर्घटना में घायल जापानी ज़ोर ज़ोर से कराह रहे थे जबकि सुभाष बोस के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था. मुझे मालूम था कि उन्हें कितनी तकलीफ़ हो रही थी."
Image caption'लेड डू रेस्ट' पुस्तक के लेखक आशिस रे के साथ रेहान फ़ज़ल बीबीसी स्टूडियो में.
फूला हुआ चेहरा
18 अगस्त, 1945 को रात के करीब 9 बजे सुभाष बोस ने दम तोड़ दिया.
आशिस रे बताते हैं, "जापान में मृत लोगों की तस्वीर खींचने की परंपरा नहीं है. लेकिन कर्नल रहमान का कहना था कि उन्होंने जानबूझ कर बोस की तस्वीर नहीं लेने दी, क्योंकि उनका चेहरा बहुत फूल चुका था."
नागोतोमो ने बताया कि नेताजी के पूरे शरीर पर पट्टियाँ बंधी थी और उनके पार्थिव शरीर को कमरे के एक कोने में रख दिया गया था और उसके चारों ओर एक स्क्रीन लगा दी गई थी. उसके सामने कुछ मोमबत्तियाँ जल रही थीं और कुछ फूल भी रखे हुए थे.
"कुछ जापानी सैनिक उसकी निगरानी कर रहे थे. शायद उसी दिन या अगले दिन यानि 19 अगस्त को उनके शव को ताबूत में रख दिया गया था. नागातोमो ने ताबूत का ढक्कन उठा कर नेताजी का चेहरा देखा था."
इमेज कॉपीरइटKEYSTONE/GETTY IMAGES
ताइपे में ही अंतिम संस्कार
विमान उपलब्ध न होने के कारण उनके पार्थिव शरीर को न तो सिंगापुर ले जाया सका और न ही टोक्यो. चार दिन बाद 22 अगस्त को ताइपे में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया. उस समय वहाँ पर कर्नल हबीबुर्रहमान, मेजर नागातोमो और सुभाष बोस के दुभाषिए जुइची नाकामुरा मौजूद थे.
बाद में मेजर नागातोमो ने शाहनवाज़ आयोग को बताया, "मैंने कुंजी से भट्टी का ताला खोला और उसके अंदर की 'स्लाइडिंग प्लेट' को खींच लिया. मैं अपने साथ एक छोटा लकड़ी का डिब्बा ले गया था. मैंने देखा कि उसके अंदर नेताजी का कंकाल पड़ा हुआ था, लेकिन वो पूरी तरह से जल चुका था."
"बौद्ध परंपरा का पालन करते हुए मैंने सबसे पहले दो 'चॉप स्टिक्स' की मदद से उनकी गर्दन की हड्डी उठाई. इसके बाद मैंने उनके शरीर के हर अंग से एक एक हड्डी उठा कर उस डिब्बे में रख ली."
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इमेज कॉपीरइटआसिश रेImage captionटोक्यो के रेन्कोज़ी मंदिर के बाहर सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां रखी गई हैं. इन्हें एक सफेद कपड़े में लपेट कर सुनहरे बक्से में रखा गया है.
सोने के कैप वाला दांत
बाद में कर्नल हबीब ने ज़िक्र किया कि उन्हें 'क्रिमोटोरियम' के एक अधिकारी ने सुभाष बोस का सोने से जड़ा एक दांत दिया था जो उनके शव के साथ जल नहीं पाया था.
आशिस रे बताते हैं, "मैं जब 1990 में पाकिस्तान गया था तो हबीब के बेटे नईमुर रहमान ने मुझे बताया था कि उनके पिता ने कागज़ से लिपटा सुभाष बोस का दाँत उनकी अस्थियों के कलश में ही डाल दिया था." वर्ष 2002 में भारतीय विदेश सेवा के दो अधिकारियों ने 'रेंकोजी' मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों की जांच की और पाया कि कागज़ में लिपटा हुआ सुभाष बोस का 'गोल्ड प्लेटेड' दाँत अब भी कलश में मौजूद है.
उस समय जापान में भारत के राजदूत रहे आफ़ताब सेठ बताते हैं, "ये दोनों अधिकारी सी राजशेखर और आर्मस्ट्रॉंग चैंगसन मेरे साथ टोक्यो के भारतीय दूतावास में काम करते थे. जब वाजपेई सरकार ने नेताजी की मौत की जाँच के लिए मुखर्जी आयोग बनाया तो जस्टिस मुखर्जी टोक्यो आए थे."
इमेज कॉपीरइटNETAJI RESEARCH BUREAUImage captionसाल 1945 में सुभाष चंद्र बोस सैगॉन एयरपोर्ट में
आशिस रे बताते हैं, "लेकिन वो खुद 'रेंकोजी' मंदिर नहीं गए थे. उनके कहने पर मैंने ही इन दोनों अधिकारियों को वहाँ भेजा था. उन्होंने कागज़ मे लिपटे उस दाँत की तस्वीर भी ली थी. लेकिन मुखर्जी आयोग ने इसके बावजूद ये तय पाया था कि नेताजी की मौत न तो उस हवाई दुर्घटना में हुई थी और न ही 'रेंकोजी' मंदिर में जो अस्थियाँ रखी हुई है, वो नेताजी की थी."
"ये अलग बात है कि मनमोहन सिंह सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया था.''
बेटी अनीता की इच्छा कि अस्थियों को भारत लाया जाए
सुभाष बोस की एकमात्र बेटी अनीता फ़ाफ़ इस समय ऑस्ट्रिया में रहती है. उनकी दिली इच्छा है कि नेताजी की अस्थियों को वापस भारत लाया जाए.
इमेज कॉपीरइटNETAJI RESEARCH BUREAUImage captionसुभाष चंद्र की पत्नी एमिली शेंकल और उनकी बेटी अनीता पैफ़
आशिस रे कहते हैं, "अनीता ने ही मेरी किताब का प्राक्कथन लिखा है. उनका कहना है कि नेताजी एक स्वाधीन भारत में वापस जा कर वहाँ काम करना चाहते थे. लेकिन वो संभव नहीं हो सका."
"लेकिन अब कम से कम उनकी राख को भारत की मिट्टी से ज़रूर मिलाया जाना चाहिए. दूसरी बात ये है कि नेताजी पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष , लेकिन वो साथ ही साथ हिंदू भी थे."
"उनकी मौत के 73 वर्ष बाद उनकी अस्थियों को भारत मंगवा कर गंगा में प्रवाहित करना उनके प्रति सही माने में राष्ट्र का सम्मान व्यक्त करना होगा."
Important Message for all सभी के लिए महत्वपूर्ण मेसेज। The hot water you drink is good for your throat. गर्म पानी जो आप पीते हैं वह आपके गले के लिए अच्छा है। But this Corona virus is hidden behind the Paranasal sinus of your nose for 3 to 4 days. लेकिन यह कोरोना वायरस आपकी नाक के परानासल साइनस के पीछे 3 से 4 दिनों तक छिपा रहता है। The hot water we drink does not reach there. गर्म पानी जो हम पीते हैं वहां तक नहीं पहुंचता है। After 4 to 5 days this virus that was hidden behind the paranasal sinus reaches your lungs. 4 से 5 दिनों के बाद यह वायरस जो परानासल साइनस के पीछे छिपा हुआ था आपके फेफड़ों तक पहुंचता है। Then you have trouble breathing. तब आपको सांस लेने में परेशानी होगी। That's why it is very important to take steam, इसलिए भाप लेना बहुत जरूरी है। Which reaches the back of your Paranasal sinus. जो आपके परानासल साइनस के पीछे पहुंचता है। You have to kill this virus in the nose with steam. आपको इस वायरस को भाप से नाक में मारना ...
1. तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या: वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!। (यहां कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।) 2. पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या: वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम!! (कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।) यहां इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृष्टि का आभास होता है। उपरोक्त वचन को ध्यान में रख वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए। 3. जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं!!...
🚩🇮🇳🚩 क्या आप श्री राम जी व श्री कृष्ण जी के भक्त हैं?? क्या आपने रामायण और महाभारत देखी है?? तो पुनः अध्ययन करें व निर्णय लें कि आप कौन हैं कहीं जाने अनजाने विधर्मी तो नहीँ बन गए हैं। कहीं जाने अनजाने राष्ट्र विरोधी तो नहीँ बन गए हैं??? यदि ऐसा कुछ है तो बाद में रोने व हाथ मलने से उचित है कि स्वार्थ, निजी समस्याओ की कचरा पेटी को त्यागकर धर्म की ओर प्रस्थान किया जाए 🙏🏻🙏🏻 कृष्ण और भीष्म पितामह मृत्युशैया संवाद भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले, "पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ? उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... ! कृष्ण चुप रहे .... ! भीष्म ने पुनः कहा , "कुछ पूछूँ केशव .... ? बड़े अच्छे समय से आये हो .... ! सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाएं " .... !! कृष्ण बोले - कहिए न पितामह ....! एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न .... ? कृष्ण ने बीच में ही टोका , "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ... मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ...
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